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रॉकेट बॉयज़ भारत के दो ऐसे पुरुषो के बारे में कहानी कहता है जो इतिहास में दर्ज है साथ में हमारे तीसरे महान वैज्ञानिक डॉ कलाम साहेब की कहानी है। कहानी भारत के इतिहास में चार महत्वपूर्ण दशकों (1940-80 के दशक) के इर्द-गिर्द सेट है और कैसे भारत एक मजबूत, बहादुर और स्वतंत्र राष्ट्र बनने की ओर बढ़ रहा और उसके राह में क्या क्या रोड़े आते है यह भी दर्शाता है।

इन तीनो की आँखों में अपने देश की उड़ान को लेकर जो सपने है उसे वे हरसंभव प्रयत्न कर पूरा करना चाहते है और हर दिन हर समय वे उन सपनो के साथ जीते है और जिन्दगी की तमाम मुश्किलों के बावजूद वे आगे बढ़ने को हमेशा तत्पर दीखाई पड़ते है। उनकी आंखों में सपने और उनके दिमाग में एक योजना के साथ  डॉ होमी जे भाभा ने भारत के परमाणु कार्यक्रम को सोचा और स्थापित किया और डॉ विक्रम साराभाई ने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम और कई अन्य संस्थानों की स्थापना की। उनकी यात्रा में मृणालिनी साराभाई, डॉ. साराभाई के जीवन में एक मजबूत स्तंभ, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम , जिन्होंने आधुनिक भारतीय एयरोस्पेस और परमाणु प्रौद्योगिकी का नेतृत्व किया और पंडित जवाहरलाल नेहरू जिन्होंने हर कदम पर उनका समर्थन किया।

होमी जहांगीर भाभा का मानना है कि अगर भारत को ताकतवर देश बनना है तो उसे अपना परमाणु बम कार्यक्रम पूरी शक्ति से आगे बढ़ाना चाहिए। दूसरी तरफ विक्रम साराभाई हैं जो अंतरिक्ष में उपग्रह भेजकर देश के आम इंसान की तकदीर बदलना चाहते हैं। दोनों की अपनी अपनी पारिवारिक जिंदगी में अनेक अनछुए पहलु है जो इनदोनो को साथ में विचारों के मतभेद के साथ आगे बढ़ते रहने को प्रेरित करता है और है अमेरिका की साजिशें, दबाव और जासूसी भी है लेकिन जहाँ एक तरफ पाकिस्तान व दूसरी तरफ चीन से घिरे भारत को रूस में अपना स्वाभाविक मददगार नजर आता है और अमेरिका, पाकिस्तान का स्वाभाविक दोस्त।

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एक शुद्ध देशी वैज्ञानिक उपलब्धियों की कहानी कहते कहते दूसरे सीजन में आकर राजनीति की चाशनी अवश्य दिखती है। जिसमे कभी थोड़ा खट्टापन और थोड़ा मीठापन भी नजर आता है। आज हमें गर्व होता है कि भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान में बड़ी ऊंचाइयां हासिल की हैं. चांद पर अपना यान उतार दिया है, मंगल तक यान भेज दिया है। साथ ही आज हम विश्व की प्रमुख परमाणु शक्ति भी हैं मगर यह रातों रात चमत्कार से संभव नहीं हो पाया है इसके पीछे देश के भविष्य को देखने वाली दृष्टि जो सी वी रमण से शुरू होकर कलाम साहेब के पोखरण परमाणु परिक्षण तक की यात्रा में अनेकानेक कठिनाइयों का सामना करते हुए  भारत को विश्व में सम्मानजनक स्थिति दिलाने की दृढ़ इच्छाशक्ति वाले वैज्ञानिक, विचारक और राष्ट्रीय नेता शामिल हैं।

होमी विश्व युद्ध के दौरान भारत लौट कर कलकत्ता के एक साइंस कॉलेज में प्रोफेसर हो जाते हैं, जबकि साराभाई कैंब्रिज में अपना रिसर्च छोड़ कर घर आ जाते हैं।  होमी जहां परमाणु विज्ञान में दिलचस्पी रखते हैं, वहीं साराभाई का सपना देश का पहला रॉकेट बनाने का है। जहां होमी जी भाभा प्रोफेसर हैं और साराभाई उनके स्टूडेंट से चलकर धीरे-धीरे दोनों दोस्त बन जाते हैं फिर कई मुद्दों जैसे भाभा के परमाणु बम बनाने के विचार से साराभाई इत्तफाक नहीं रखते हुए उसके इस प्रोजेक्ट से अपने आपको अलग करते है लेकिन दोस्ती अभी तक कायम रहती है साथ में दोनों के बीच चिट्ठियों का आदान प्रदान होता रहता है इसी क्रम में 1942 में महात्मा गांधी के “अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन” से प्रभावित होकर होमी और साराभाई कॉलेज में एक दिन अंग्रेजी झंडा उतार कर स्वराज का तिरंगा लहरा देते हैं और यहीं से उनका मुश्किल वक्त शुरू होता है उनके रिसर्च के लिए आने वाले पैसे रोक लग जाती है फिर भाभा कॉलेज से अपनी नौकरी छोड़ कर मुंबई जाते हैं और जेआरडी टाटा के साथ उनका नया सफर शुरू होता है टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च के रूप में। दूसरी तरफ साराभाई पढ़ाई के साथ-साथ अपने पिता के कारोबार में हाथ बंटाते है और वे कपड़ा मिलों को आधुनिक बनाना चाहते हैं लेकिन यूनियन लीडरों का विरोध सहना पड़ता है इसके बावजूद वे किसी तरह से वे इसमें कामयाब हो गए और अहमदाबाद टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज़ रिसर्च एसोसिएशन स्थापित करने में कामयाब भी हुए बाद में उन्होंने अहमदाबाद में ही इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ अहमदबाद भी स्थापित किया।

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दूसरे सीजन की शुरूआत 1962 के युद्ध के बाद से होती है, जब भारत चीन से हार चुका था। हमारे देश के कुछ हिस्से पर भी चीन ने कब्जा कर लिया था. ऐसे में डॉ. होमी जहांगीर भाभा न्यूक्लियर बम बनाने के अपने प्रोग्राम को तेज कर देते हैं। लेकिन अमेरिका सहित चीन और पाकिस्तान इस प्रोग्राम पर नजर बनाए हैं साथ में भाभा की टीम में कुछ लोग ऐसे हैं, जो पैसों की लालच में अमेरिकन खुफिया एजेंसी सीआईए के लिए काम करते हैं। सीआईए को जब पता चलता है कि भाभा न्यूक्लियर रिएक्टर बनाने की दिशा अपना काम तेज कर दिए हैं, तो वो उनको मारने की कोशिश करते हैं, लेकिन किस्मत से वे बच जाते हैं। इधर, साराभाई लगातार सरकारी विरोधो के बावजूद थुंबा में अपनी टीम के साथ सैटेलाइट लॉन्च करने की कोशिश में लगे रहते है लेकिन उनको सफलता नहीं मिल पाती हैं और यही वजह होती है की सरकार इनके बजट में कटौती कर देती है।

ऑडिट ऑफिसर का डॉ. विक्रम साराभाई से यह कहना की  “सर हम 62 की लड़ाई हार चुके हैं. पाकिस्तान की सेना सीमा पर खड़ी है. ऐसे में आप ही बताइए कि डिफेंस बजट कहां खर्च करना चाहिए? सेना पर या फिर रॉकेट उड़ाने पर?” इस पर साराभाई बिना कोई जवाब दिए अपने सपने की उड़ान को वास्तविक रूप देने में लगे रहते है उनका मानना है कि स्पेस में सैटेलाइट लॉन्च होने से लोगों की जिंदगी आसान हो पायेगी। उनके टेलीविजन के जरिए सही सूचनाएं मिलेंगी. मौसम का पूर्वानुमान होगा, जिससे प्राकृतिक आपदा से बचने में मदद मिलेगी. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम उनके विजन को पूरा करने में जी जान से मदद करते हैं।

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इन्ही सब द्वंदों से निपटते हुए कैसे तीनों महान वैज्ञानिक अपने अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए अपना सर्वस्व लगा देते है और कैसे अलग अलग परिस्थितियों से निपटने के लिए तरीके निकालते है यही इस सीरीज की खासियत है। हाँ सीरीज में थोड़ा अंग्रेजी में संवाद का उपयोग हुआ है जिससे आम ठेठ हिंदी भाषी को थोड़ी दिक्कत हो सकती है लेकिन कुल मिलकर सीरीज अच्छी बन पडी है पहले सीज़न में कहानी पर पकड़ काफी अच्छी है लेकिन सीज़न 2 में थोड़ा ढीलापन नजर आता है। खैर अगर आप एतिहासिक दृष्टी से और भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों के बारे में जानना चाहते है यह एक अच्छा अवसर हो सकता है।

धन्यवाद
शशि धर कुमार