लोकसंस्कृति और साहित्य साधना के योगी – डॉ. बीरेन्द्र कुमार ‘चन्द्रसखी’

लोकसंस्कृति और साहित्य साधना के योगी – डॉ. बीरेन्द्र कुमार ‘चन्द्रसखी’ भारतीय लोकसंस्कृति की परंपरा केवल गीतों और उत्सवों तक सीमित नहीं है; यह हमारी सामूहिक स्मृति, भाषा, समाज और संवेदनाओं का जीवंत इतिहास है। इस विरासत को शब्द, शोध और सांगीतिक चेतना के माध्यम से...

फणीश्वर नाथ रेणु : ग्रामीण यथार्थ का राष्ट्रीय स्वर

फणीश्वर नाथ रेणु : ग्रामीण यथार्थ का राष्ट्रीय स्वर हिंदी साहित्य के इतिहास में जब भी ग्रामीण भारत की सजीव, धड़कती और बहुआयामी तस्वीर की चर्चा होगी, तब फणीश्वर नाथ रेणु का नाम अग्रणी रूप से लिया जाएगा। उन्होंने न केवल गाँव को साहित्य का विषय बनाया, बल्कि उसे राष्ट्रीय...

वीरेंद्र यादव : शब्दों के विवेकशील प्रहरी को श्रद्धांजलि

“वीरेंद्र यादव”शीर्षक: वीरेंद्र यादव : शब्दों के विवेकशील प्रहरी को श्रद्धांजलि वरिष्ठ आलोचक वीरेंद्र यादव का देहावसान हिंदी साहित्य जगत के लिए एक गहरी क्षति है। वे केवल आलोचक नहीं थे, बल्कि साहित्य की आत्मा के सजग पहरेदार थे—ऐसे विवेकशील पाठक, जिन्होंने...

मकर संक्रांति: उत्तरायण होता लोकजीवन और अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा

“मकर संक्रांति”शीर्षक: मकर संक्रांति: उत्तरायण होता लोकजीवन और अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा भारतीय सभ्यता में पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते; वे समय, समाज और स्मृति के साझा दस्तावेज़ होते हैं। मकर संक्रांति ऐसा ही एक पर्व है—जो खगोलीय घटना से आरंभ...

युवाशक्ति और स्वामी विवेकानंद की दृष्टि

“युवाशक्ति और स्वामी विवेकानंद की दृष्टि”शीर्षक: युवाशक्ति और स्वामी विवेकानंद की दृष्टि भारत की आत्मा को आधुनिक युग में जिस व्यक्तित्व ने सबसे अधिक आत्मविश्वास, तेज और वैश्विक पहचान दी, उनमें स्वामी विवेकानंद का नाम अग्रणी है। वे केवल एक संन्यासी या...

अध्यात्म, ध्यान और चेतना: क्या यह सिर्फ भरे पेट वालों की विलासिता है?

“अध्यात्म, ध्यान और चेतना”शीर्षक: अध्यात्म, ध्यान और चेतना: क्या यह सिर्फ भरे पेट वालों की विलासिता है? आज के समय में जब महँगाई, बेरोज़गारी, सामाजिक असमानताएँ और मानसिक तनाव लगातार बढ़ रहे हैं, ऐसे में “अध्यात्म, ध्यान और चेतना” जैसे शब्द कई लोगों को या तो...