मकर संक्रांति: उत्तरायण होता लोकजीवन और अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा

“मकर संक्रांति”शीर्षक: मकर संक्रांति: उत्तरायण होता लोकजीवन और अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा भारतीय सभ्यता में पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते; वे समय, समाज और स्मृति के साझा दस्तावेज़ होते हैं। मकर संक्रांति ऐसा ही एक पर्व है—जो खगोलीय घटना से आरंभ...

युवाशक्ति और स्वामी विवेकानंद की दृष्टि

“युवाशक्ति और स्वामी विवेकानंद की दृष्टि”शीर्षक: युवाशक्ति और स्वामी विवेकानंद की दृष्टि भारत की आत्मा को आधुनिक युग में जिस व्यक्तित्व ने सबसे अधिक आत्मविश्वास, तेज और वैश्विक पहचान दी, उनमें स्वामी विवेकानंद का नाम अग्रणी है। वे केवल एक संन्यासी या...

अध्यात्म, ध्यान और चेतना: क्या यह सिर्फ भरे पेट वालों की विलासिता है?

“अध्यात्म, ध्यान और चेतना”शीर्षक: अध्यात्म, ध्यान और चेतना: क्या यह सिर्फ भरे पेट वालों की विलासिता है? आज के समय में जब महँगाई, बेरोज़गारी, सामाजिक असमानताएँ और मानसिक तनाव लगातार बढ़ रहे हैं, ऐसे में “अध्यात्म, ध्यान और चेतना” जैसे शब्द कई लोगों को या तो...

हां भइया, जीवन है ये!

“हां भइया, जीवन है ये!”शीर्षक: हां भइया, जीवन है ये! हां भइया, जीवन है ये —ना कोई मेले की चकाचौंध, ना छप्पन भोग,बस आधी रोटी, और फटी धोती का संजोग।टूटे खपरैल में सपने टपकते हैं,मां की सूखी छाती पर बच्चे सिसकते हैं। चौधरी की चौखट झुके-झुके नशा हो गई,बापू की...

भारतीय समाज में काले और गोरे की मानसिकता

“भारतीय समाज में काले और गोरे की मानसिकता”भारत में ‘काले और गोरे’ का मुद्दा केवल त्वचा के रंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की मानसिकता, संस्कृति और इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है। रंगभेद की यह मानसिकता औपनिवेशिक काल से पहले भी विद्यमान थी, लेकिन...