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हिंदी पखवाड़ा सरकारी तौर पर १५ दिन का कार्यक्रम होता है जो लगभग हर सरकारी संस्थानों में मनाया जाता है। इसमें हर संस्थान अपने-अपने यहाँ हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए साल भर के कामों का लेखा-जोखा रखता है या यूँ कहे कि वे यह कहते है कि हमने इतना काम हिंदी में किया जैसे कि साल भर में इतने लेख इतनी पत्रिकाओं में विज्ञापन या हमने संस्थान के मुख्य स्थानों पर इतने बैनर पोस्टर लगाये या कि यहाँ हिंदी में भी काम काम किया जाता है आदि-आदि। इसी बीच हिंदी दिवस भी आ जाती है तो लोग बड़ी उत्साह के साथ हिंदी दिवस मनाते नजर आते है और स्वाभाविक है भारत जैसे देश में जहाँ कहा जाता है कि उसकी भाषाई धड़कन हिंदी है वो इसीलिए भी क्योंकि हिंदी विश्व में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है और उत्तर भारत में हिंदी बोलने वाले लोग तो बहुतायत में पाये जाते है ये अलग बात है कि सबकी हिंदी की अपनी-अपनी बोली कह ले उसमें लोग बोलते है। हिंदी दिवस मनाना कोई बड़ी बात नहीं होनी चाहिए लेकिन सवाल यह है कि भारत में ही अगर हिंदी दिवस मनाना पड़े तो सोचनीय हो जाती है। हिंदी हमारे अंग-अंग में रची बसी है फिर हम हिंदी दिवस क्यों मनाते है हमारी ५० करोड़ लोगों की भाषा जब हिंदी हो तो भी हमें हिंदी दिवस मनाने की आवश्यकता क्यों है? इस बात का उत्तर मुझे मिला “गाँधी और हिंदी” नाम के किताब में जहाँ गाँधी को उद्धरित करते हुए लेखक लिखते है कि “करोड़ों लोगो को अंग्रेजी की शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने एक शिक्षा की जो बुनियाद डाली, वह सचमुच गुलामी की बुनियाद थी। यह क्या कम जुल्म की बात है कि अपने देश में गर मुझे इन्साफ पाना हो तो मुझे अंग्रेजी भाषा का उपयोग करना पड़े। इसमें मैं अंग्रेजों का दोष निकालूँ या अपना? हिन्दुस्तान को गुलाम बनाने वाले तो हम अंग्रेजी जाननेवाले लोग है। प्रजा की हाय अंग्रेजों पर नहीं पड़ेगी बल्कि हम लोगों पर पड़ेगी।” यह बातें महात्मा गाँधी जी ने १९०९ में हिंदी स्वराज्य में लिखा था।

गाँधी और हिंदी की बातें निराली है वो इसीलिए कि वे खुद विदेश से बैरिस्टरी कर आये और दक्षिण अफ्रिका गए अपनी बैरिस्टरी का अभ्यास करने लेकिन जब वे भारत वापस आये तो उन्हें समझ आया कि हिंदी के बिना उनका काम नहीं चल सकता है और अगर आप उनको पढ़ते है तो पता चलता है कि वे दस भारतीय भाषाओं में अपना हस्ताक्षर कर सकते थे। गाँधी के अनुसार आप हिंदी अवश्य पढ़िए और उसका अपने जीवन में उपयोग बढ़ाइए और बाँकी भाषाएँ भी सीखिए ताकि अगर भारत के ही किसी और राज्य में आप जाए तो कम से कम वहाँ जिस भाषा का उपयोग होता हो आप उस भाषा में अपना काम चला सके। ५ फरवरी १९१६ को काशी प्रचारिणी सभा में भाषण देते हुए गांधी जी ने कहा था कि हम सब को अदालतों में हिंदी में काम करने पर तवज्जों देनी चाहिए और युवाओं से उन्होंने निवेदन किया कि वे कम से कम अपने हस्ताक्षर से शुरू करे फिर आपस में हम भारतीय चिठ्ठियों में हिंदी को बढ़ावा दे तभी हिंदी सम्मानित हो पायेगी। उनका कहना था कि तुलसीदास जी जैसे कवि ने जिस भाषा में अपनी कविता की हो वह भाषा अवश्य ही पवित्र होगी। वही ६ फरवरी १९१६ को काशी विश्वविद्यालय में भाषण देते हुए उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि इस सम्मलेन जो हिंदी भाषियों के लिए गढ़ माना जाता है वहाँ भी हमें अंग्रेजी में बोलना पड़ रहा है तो हमें शर्म आनी चाहिए कि जो भाषा हमारे दिल में दिल के अन्दर से निकलनी चाहिए उसके लिए हम कोई प्रयास नहीं कर रहे है। अंग्रेजीं में निकली बातें दिल तक नहीं जाती है उन्होंने इसका एक उदहारण देते हुए बताया कि बम्बई जैसे शहर में जो हिंदी भाषी नहीं है लेकिन वहां हिंदी में दिए गए भाषणों पर लोग ज्यादा तवज्जों देते है।  २९ दिसंबर १९१६ लखनऊ में वे कहते है मैं गुजरात से आता हूँ और मेरी हिंदी टूटी फूटी है फिर मुझे थोड़ी भी अंग्रेजी का प्रयोग पाप लगता है। सवाल यह है कि जब गाँधी जी हिंदी को लेकर इतने मुखर थे और आज़ादी के आन्दोलन में उन्होंने हमेशा प्रयास किया कि हिंदी को एक एक सशक्त भाषा के रूप में स्थान मिले और हिंदी एक विश्व भाषा के रूप में अपना स्थान बना सके लेकिन जैसा उन्होंने खुद कहा था कि मैकाले ने जो करना था उसने कर दिया और अपने लिए एक पौध बनानी थी उसने बनाई जिसका नतीजा आज भी हम भुगत रहे है।

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मैंने पहले भी कहा है कि हिंदी को देवनागरी में लिखने से ज्यादा प्रचार हो सकता है लेकिन आजकल मोबाइल और लैपटॉप के आ जाने से लोग हिंदी को देवनागरी की जगह रोमन लिपि में लिखने लगे है और सबसे ज्यादा दिक्कत हिंदी भाषी क्षेत्र में रहने वाले लोगों के साथ है यही गांधी जी ने भी महसूस किया तभी उन्हें लखनऊ, बनारस, कानपुर, इंदौर, बम्बई आदि जगहों पर इसपर काफी बात करना पड़ा ताकि लोग हिंदी के प्रति अपने लगाव में बढ़ोतरी कर सके। हम मातृभाषी तो हिंदी में रहना चाहते है लेकिन बोलना हम अग्रेज़ी में चाहते है क्योंकि मैकाले के समय से अंग्रेजीं में बोलने वालों को जो अहमियत मिली कि वे एक अभिजात वर्ग से आते है और उन्हें हिंदी में बोलने में झिझक महसूस होने लगी और यही आज तक होता आ रहा है। कही भी आप हिंदी की जगह अंग्रेजी में बोल दिए तो आपको समझदार माना जाएगा और हिंदी में बोलने पर देशी या देहाती जैसे उपाधियों से नवाज़ा जाएगा। जिन सरकारी संस्थानों की बात मैंने पहले की है वहाँ भी आपको यह लिखा हुआ मिलेगा कि यहाँ पर हिंदी में भरे हुए फॉर्म या हिंदी में लिखे गए फॉर्म को भी स्वीकार किये जाते है क्या यह अपनी ही भाषा के लिए लज्जायुक्त होने वाली बात नहीं है यही तो महात्मा गाँधी ने कहा था कि हमें अपने ही अदालतों में न्याय पाने के लिए हमें अंग्रेजी में फ़रियाद करनी पड़ती है। तो सवाल यही है हिंदी ज्यादा सरल है या अंग्रेजी जिसकी वजह से कार्यालयों में हिंदी की जगह अंगरेजी ने अपना पहला स्थान पाया हुआ है। हिंदी हमारी अपनी भाषा है और हमें इसी में ही अपने ज्यादातर काम पुरे करने चाहिए। भाषा से हम अपने चरित्र को प्रतिबिंबित कर सकते है जैसे अगर आप अफ्रीका में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा अफ़्रीकांस को समझ पा रहे है बोल पा रहे है तो संभव है उनके लोगो द्वारा मनाये जाने वाली त्योहारों और उनके संस्कृतियों के बारे में भी समझ सकेंगे। कहा जाता है अगर भाषा में सच्चाई और दयालुता नहीं है तो उस भाषा को बोलने वाले लोगों में सच्चाई और दयालुता नहीं हो सकती है और हमारी हिंदी में यह कूट-कूट कर भरी हुई है। एक कहावत है “यथा भाषक तथा भाषा” – अर्थात जैसा बोलनेवाला वैसी भाषा। मैं बारम्बार यह कहता आया हूँ कि हम हिंदी भाषियों ने ही हिंदी का बेड़ा गर्क किया है क्योंकि सबसे ज्यादा हिंदी भाषियों ने ही हिंदी भाषा का अनादर किया है क्योंकि उन्हें लगता है वे हिंदी भाषी क्षेत्र में पैदा हुए है तो उन्हें हिंदी भाषा अच्छे से आती है और वे इस बात को लेकर कभी भी अपने अन्दर झाँकने का प्रयास नहीं करते है कि उनकी हिंदी में भी त्रुटियाँ है या हो सकती है। जिस राष्ट्र ने अपनी भाषा का अनादर किया है उन्होंने अपनी राष्ट्रीयता खोयी है। पुरे धरा पर भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ आज माता-पिता अपने बच्चो को माँ-बाबूजी की जगह मम्मी-डैडी बोलना सिखाते है कमरे की जगह रूम हो गया रसोईघर की जगह किचन हो गया ऐसी कई बाते कालांतर में हुई जिसकी वजह से हिंदी भाषा का क्षय हुआ धीरे धीरे ही सही यह लगातार होता चला गया पिछले कुछ सालों से मैकाले की शिक्षा पद्धति का विरोध हो रहा है लेकिन लोग उसके जड़ में झांकना नहीं चाहते है कि मैकाले की एक ही विरासत थी। वह हमें देकर चले गए और हम आज तक उनसे पीछा नहीं छुड़ा पाए वह  है अंग्रेजी भाषा के प्रति हमारा मोह। हिंदी को जीवन में अपनाए तभी हिंदी की सार्थकता साबित हो पायेगी सभी भाषाओ का सम्मान करना सीखे,  खासकर हिंदी अगर आपकी मातृभाषा है तो यह बहुत जरुरी हो जाता है। गाँधी जी भी कहते थे “अंग्रेजी हमारी जरूरत हो सकती है आवश्यकता नहीं।” लेकिन हमने उसे जरुरत बना दिया है यही वजह है संस्थानों में “यहाँ अंग्रेजी में भी फॉर्म या आवेदन स्वीकार किये जाते है” की जगह हमने “यहाँ हिंदी में भी फॉर्म या आवेदन स्वीकार किये जाते है” लिखा हुआ मिलने लगा। यह साबित करता है कि हम अपनी मातृभाषा के प्रति कितना लज्जित महसूस करते है।

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अंग्रेजो को गालियाँ देने वाले उस समय भी अंग्रेज़ियत के शिकार थे और आज भी है उन्हें यह नहीं समझ आता है कि अंग्रेजी मात्र एक भाषा है उसे सीखने में आप जितना मेहनत करते है उससे कही कम समय में कई और भाषाएँ सीख सकते है। यहाँ पर लोगों को लगता है कि अगर वे अंग्रेज़ों या अमरीकियों की तरह अंग्रेजी बोलने में माहिर हो जाते है लगने लगता है कि वे बड़े बुद्धिजीवी हो गए ऐसा नहीं है। अगर आप अंग्रेज़ी जितना धाराप्रवाह बोल पाते है उसी धाराप्रवाह से अगर कोई स्पेनिश या मंदारिन या फ्रेंच या रूसी भाषा बोल सकता है तो क्या वह भी उतना ही बड़ा विद्वान दिखने का शौक पाल सकता है शायद नहीं। डॉ सुरेश पंत जी की किताब “शब्दों के साथ-साथ” जिसमें शब्दों के प्रयोग और उसकी व्याख्या को विस्तृत तरीके से पेश किया है। किताब में डॉ पंत लिखते है “हिंदी बहुत कठिनताओं के साथ अपना प्रवाह निरंतर और बहुमुखी रखा है और जीवन के विविध क्षेत्रों में सामाजिक आर्थिक विकास के साथ-साथ हिंदी का प्रयोग बढ़ रहा है। प्रचार प्रसार के इस दौर में हिंदी का स्वरुप में क्षेत्रीय प्रभाव अधिक पड़ रहा है। अब हिंदी में पूर्वी हिंदी या पश्चिमी हिंदी का ही अंतर नहीं रहा; हैदराबादी हिंदी, मुम्बइया हिंदी, कोलकाता वाली हिंदी जैसी क्षेत्रीय पहचाने स्पष्ट दिखाई पड़ता है जो हिंदी की भेद नहीं, हिंदी की विशेषताएं है।” यह साबित करता है हिंदी ने अपने आपको कभी बढ़ने से रोका उसे जहाँ जिसने प्यार दिया उसी के हो लिए यही बात डॉ पंत की इस बातों से महसूस किया जा सकता है। आज जो हिंदी लिखी या बोली जाती है। वह हर क्षेत्र में स्थानीय तौर पर बोली जानी वाली बोलियों का सम्मिश्रण है आप बिहार के सीमांचल में जायेंगे तो आपको हिंदी में ठेठी जो अंगिका का ही अप्रभंश बोला जाता है उसका मिश्रण मिलेगा अगर आप भागलपुर परिक्षेत्र में होंगे तो वहाँ अलग है अगर आप भोजपुर में है तो वहाँ अलग है अगर आप मिथिला में है तो वहाँ अलग है अगर आप नेपाल जाएँ तो वहाँ आपको अलग मिलेगी। उसी प्रकार मध्य प्रदेश में अलग अलग परिक्षेत्र के हिसाब से आपको सम्मिश्रित हिंदी ही मिलेगी। अगर आप उत्तर प्रदेश की बात करे तो आपको उसमे ब्रज भाखा, बुन्देली, चंदेली आदि का सम्मिश्रण मिलेगा। अगर आप हरियाणा जाएँ तो वहां की हिंदी अलग है अगर आप राजस्थान जाएँ तो वहां की हिंदी अलग है तो सवाल है हिंदी है क्या? हिंदी बोलने में और लिखने में अलग अलग हो जाती है क्योंकि बोलने में बोली का सम्मिश्रण होता है लेकिन लिखने में तो व्याकरण के प्रयोग के कारण एक ही रहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि दिल्ली, राजस्थान, बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र या उत्तर पूर्व के राज्यों की हिन्दी भी गलत कही जा सकती है। जैसा कि कहा जाता है कि “गरीब के कान का सोना भी पीतल” कह दिया जाता है। बिहार के लोग जब हिंदी बोलते हैं तो वो दरअसल अपनी क्षेत्रीय (भोजपुरी, मगही, मैथिली, अंगिका, ठेठी आदि) के शब्दों को हिन्दी में मिश्रण के साथ बोलते हैं। डॉ पन्त के इन बातों को समझने के लिए उनकी इस किताब के साथ उनके आज तक के सहयोगी चैनल पर उनका इंटरव्यू “राजनीति की भाषा या भाषा की राजनीति!” नाम से अवश्य सुनने लायक है। ऐसी ही तीन अंक किताबों की सीरीज है “शब्दों का सफ़र” जिसे अजित वडनेरकर जी ने लिखा है शब्दों का संयोजन और उसकी व्याख्या से हिंदी के बारे में या उसके शब्दों के इस्तेमाल पर काफी बारीक नजर से व्याख्या किया है। जो हिंदी भाषा के विद्यार्थी या अध्येताओं के लिए काफी उपयोगी है।

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२३ सितम्बर को राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की जयंती हो और आप हिंदी पर बात कर रहे हो और उनका उल्लेख ना हो मुश्किल लगता है तो मैं यहाँ २० जून १९६२ दिल्ली में राज्यसभा में राष्ट्रकवि दिनकर जी ने जो बातें कही उसके बारे में उल्लेख करना चाहूँगा। उन्होंने कहा था – “देश में जब भी हिंदी को लेकर कोई बात होती है, तो देश के नेतागण ही नहीं बल्कि कथित बुद्धिजीवी भी हिंदी वालों को अपशब्द कहे बिना आगे नहीं बढ़ते। पता नहीं इस परिपाटी का आरम्भ किसने किया है, लेकिन मेरा ख्याल है कि इस परिपाटी को प्रेरणा प्रधानमंत्री से मिली है। पता नहीं, तेरह भाषाओं की क्या किस्मत है कि प्रधानमंत्री ने उनके बारे में कभी कुछ नहीं कहा, किन्तु हिंदी के बारे में उन्होंने आज तक कोई अच्छी बात नहीं कही। मैं और मेरा देश पूछना चाहते हैं कि क्या आपने हिंदी को राष्ट्रभाषा इसलिए बनाया था ताकि सोलह करोड़ हिंदी भाषियों को रोज अपशब्द सुनाएं? क्या आपको पता भी है कि इसका दुष्परिणाम कितना भयावह होगा?” यह सुनकर पूरी सभा सन्न रह गई। चुप्पी तोड़ते हुए दिनकर जी ने फिर कहा- ‘मैं इस सभा और खासकर प्रधानमंत्री नेहरू से कहना चाहता हूं कि हिंदी की निंदा करना बंद किया जाए। हिंदी की निंदा से इस देश की आत्मा को गहरी चोट पहुँचती है।‘ यह वक्तव्य आप राज्यसभा की वेबसाइट पर भी पढ़ सकते है। उस दिन और भी कई बातें उन्होंने हिंदी को लेकर कही। हिंदी के लिए लिए प्यार सबके दिलों में हमेशा से रही है लेकिन कई बार यह ज्यादा दुखदायी दिखता है कि हिंदी भाषियों ने ही हिंदी का बेड़ा गर्क करने का भार उठाया हुआ है।

आखिर में मैं हिंदी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण व्यक्तियों को उनका हिंदी के प्रति प्यार को उन्हीं के शब्दों में:
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,
बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।
अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन,
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।”

~भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

“पुरस्कारों के नाम हिन्दी में हैं
हथियारों के अंग्रेज़ी में
युद्ध की भाषा अंग्रेज़ी है
विजय की हिन्दी।”

~रघुवीर सहाय

“लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है
मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिन्दी मुस्कुराती है।”

~ मुनव्वर राना
धन्यवाद
©️शशि धर कुमार