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विस्तृत यात्रा वृतांत पढ़ने का मेरा यह पहला अनुभव है जो अंग्रेजी में लिखे “Footloose in the Himalaya” का हिंदी अनुवाद “एटकिन का हिमालय” के नाम से हृदयेश जोशी जी ने अनुवादित किया है। हृदयेश जोशी जी के बारे मेरी समझ सिर्फ इतनी है कि एक सुलझे हुए पत्रकार जो वातावरण से संबंधित लेखों पर खूब काम किया है और जब भी मौका मिला चाहे TV के माध्यम से या किसी और माध्यम से उन्हें पढ़ना या सुनना हमेशा अच्छा लगा। एक ऐसा व्यक्ति जो पर्यावरण को लेकर इतना सजग है जो इसके ऊपर बात करने से कभी भी नही हिचका। आज भी उनके रिपोर्ट और लेख पर्यावरण से संबंधित जब भी पढ़े या सुने हमेशा आँखे खोलने वाला होता है। एक लाइन में अगर आप इनके व्यक्तित्व की बात करे तो ऐसा पर्यावरणवादी है जो पहाड़ो को लेकर पहाड़ में रहकर उसके बारे में ज़मीनी हक़ीक़त बताने वाला है।

एटकिन का हिमालय किताब ऐसी पहली किताब है जिसके 348 पन्ने को मैंने तकरीबन 10 घंटे में समाप्त किया। मैंने अपने जीवन में बहुत सारे किताब और रिपोर्टें पढ़ी है लेकिन आधुनिक उपन्यास के नाम पर मैंने कुछ भी नही पढ़ा है हाँ साहित्यिक तौर पर जिसे आप क्लासिक की गिनती में रखते है उसको पढ़ने की एक लंबी फेहरिस्त अवश्य है तो मैं अपने पढ़ने की गति को भली भांति समझता हूँ। इसीलिए इस किताब को 10 घंटे में खत्म करना (अपने काम को करते हुए) मेरे लिए बहुत ही आश्चर्यजनक रूप से खुशी प्रदान करने वाला है। किसी को लगता है कि यह गति कुछ भी नही तो मैं समझ सकता हूँ।

यह किताब मुझे पहाड़ को समझने में काफी मदद करने वाली साबित होगी क्योंकि यह किताब सिर्फ उत्तराखंड के पहाड़ो को लेकर नही है यह यात्रा वृतांत कश्मीर के डल झील से लेकर अरुणाचल के तवांग घाटी तक कि लगातार निरंतर कई दशकों की यात्राओं का एक अद्भुत संकलन है। यह उन सभी सहायकों को समर्पित यात्रा वृतांत है जो आपको पहाड़ो पर अपने यात्रा के दौरान वहाँ के मौसम, रास्तों, नदी और नालों के दोनों पक्षों को समझने में भी मदद करता है। यह पहाड़ के उन खुशनुमा जीवन से भी आपको रूबरू करवाता है जिसके बारे में पहाड़ी यात्रा में आप सोच भी नही सकते है। पहाड़ी यात्रा को सुगम बनाने के लिए आपके हमराही जो हमेशा आपकी यात्रा में साथ नही होते है उनके बारे में भी यह विस्तार से बताता है। यह एक आत्मकथात्मक शैली में लिखा एक ऐसा यात्रा वृतांत है जो आपको हिमालय के विहंगता के बारे में विस्तार से बताने की कोशिश करता है। इस यात्रा वृतांत से आप हिमालय की क्रूरता के साथ साथ उसके दयालुता के भी कायल हुए बिना नही रह पाएंगे। लेखक का हिमालय के लिए शिवालय या नंदा देवी पर्वत के लिए माई जैसे शब्दों का उपयोग हिमालय और प्रकृति के प्रति उनका अथाह प्रेम दर्शाता है। उनके इस यात्रा वृतांत से आपको महसूस होगा कि स्कॉटलैंड में जन्मा बच्चा कोलकाता होते हुए जब पहली बार पहाड़ी जमीन पर पैर रखता है तो उन्हें लगता है यही उनकी आखिरी पसंद है, यह एक अध्यात्म से जुड़े व्यक्ति के लिए ही संभव है। यहाँ अध्यात्म का मतलब पाखंड भरा पूजा पाठ से कतई नही है। इसके बारे में कई बार लेखक ने अपने इस यात्रा वृतांत के माध्यम से हल्के शब्दों में ही सही लेकिन काफी मजबूत तरीके से रखने का भरपूर प्रयास किया है। इस यात्रा वृतांत में आप पहाड़ की हर अच्छी बात से लेकर ऐसी और भी कई बातों से रूबरू होते है जिसके बारें में कुछ लोगों को अच्छा नही लगेगा, लेकिन लेखक ने बड़ी मजबूती और ख़ूबसूरती के साथ हर बात को रखा है जिसको उन्होंने महसूस किया और देखा या सुना। मेरा झुकाव पिछले कुछ सालों में साहित्य से लेकर भाषा को जानने की ललक के बीच ऐसे कई किताबें या रिपोर्टें या लेखों की एक लंबी फेहरिस्त है जिसे मैंने पढा है खासकर सामाजिक विज्ञान से सम्बंधित, मैं व्यक्तिगत तौर पर इस किताब को भी उसी तरीके के सामाजिक विज्ञान के श्रेणी में रखना पसंद करूँगा जो आपको अपने शब्दों के माध्यम से एक समाज को सम्पूर्णता के नजर से देखने में मदद करता है। और यह किताब मुझे उत्तराखंड के सम्पूर्ण सामाजिक ढाँचे को समझने में मदद करता है। इसी किताब ने मुझे उत्तराखंड के गैज़ेटीयर भी पढ़ने के लिए उत्साहित करता है और अगले कुछ समय में शायद उसे पढूँगा भी।

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हिमालय में एक सामान्य ट्रैकिंग के लिए भी बहुत सारी ऊर्जा और संकल्प की आवश्यकता होती है। लेखक का यह कथन की “प्रकृति की ख़ूबसूरती और उसकी भव्यता के आगे इंसान की कोई बिसात नही है” दर्शाता है कि प्रकृति की भव्यता तभी तक अच्छी है जबतक आप उसके ताल में ताल मिलाकर नही चलते है। आपके उसके नियमों से ही उसके साथ चलने को बाध्य होते है आप अपने नियम या कायदे कानूनों से उसको एक सेकंड के लिए भी अपने साथ चलने को मजबूर नही कर सकते है। लेखक ने गाँव की मद्धम रफ्तार नाम के लेख में बताया है कि पहाड़ो की अपनी जीवन शैली होती है या उनके विकास को देखने का अपना तरीका होता है जिसमें कई बार अनावश्यक हस्तक्षेप ही उसके अपने विकास के सोच में बाधक होता है। ऐसा नही है कि ग्रामीण नई तकनीकों को लेकर हमेशा निराशावादी रहे है इसी किताब में लेखक ने प्रेशर कुकर का उदाहरण भी दिया है कैसे इसको पहाड़ पर हाथो हाथ लिया गया और आज लगभग हर घर मे प्रेशर कुकर पर खाना पकता है क्योंकि यह उनकी जरूरत के साथ साथ उनका ईंधन और समय दोनों बचाता है।

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इस किताब को जिस तरीके से हृदयेश जी ने अनुवादित किया है क़ाबिले तारीफ़ है क्योंकि मुझे नही लगता है कि बिल एटकिन साहेब इससे अच्छा अनुवाद चाहते हो। यह सर्वश्रेष्ठ अनुवादित किताब है जिससे कभी भी ऐसा नही लगता है कि एटकिन साहेब की जगह हृदयेश जी अपनी बात कह रहे है।

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एक बार फिर से धन्यवाद इस अद्वीतीय कृति के लिए।

शशि धर कुमार