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एशियन गेम्स 2026 में भारतएशियन गेम्स 2026: भारत के 85 पदकों के पीछे की ऐतिहासिक कहानी

एशियन गेम्स 2026 अब इतिहास का हिस्सा बन चुका है। जापान के आइची-नागोया में हुए इन खेलों में भारत ने 21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य सहित कुल 85 पदक जीतकर चौथा स्थान हासिल किया। पदकों की संख्या 2022 के हांगझोउ खेलों के रिकॉर्ड से कम है, इसलिए पहली नज़र में यह प्रदर्शन पिछली उपलब्धि से पीछे दिखाई देता है। लेकिन भारतीय खेल की कहानी केवल पदक-तालिका पढ़कर समझना संभव नहीं है। दरअसल, आइची-नागोया की सबसे महत्वपूर्ण कहानी यह है कि भारत ने कुछ ऐसे दरवाजे खोले हैं, जो दशकों से बंद थे।

कुछ पदक नहीं, कई ऐतिहासिक दरवाजे खुले
इस बार भारत को कई ऐसी उपलब्धियां मिलीं जिन्हें केवल एक पदक कहना उनके महत्व को कम कर देना होगा। गोल्फ में प्रणवी उर्स ने महिला व्यक्तिगत स्पर्धा में भारत का पहला एशियन गेम्स स्वर्ण जीतकर इतिहास रच दिया। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने दुनिया की शीर्ष खिलाड़ियों के बीच यह सफलता हासिल की। शूटिंग में नीरू धांडा का व्यक्तिगत ट्रैप स्वर्ण 48 साल के इंतज़ार के बाद आया। वहीं नीरू धांडा और कयनान चेनाई ने मिश्रित ट्रैप स्पर्धा में भारत को इस इवेंट का पहला एशियन गेम्स स्वर्ण दिलाया। तीरंदाजी में कुमकुम अनिल मोहोड पहली भारतीय महिला बनीं जिन्होंने व्यक्तिगत रिकर्व स्वर्ण जीता, जबकि भारतीय महिला रिकर्व टीम ने दक्षिण कोरिया के 28 वर्षों के वर्चस्व को समाप्त किया। एथलेटिक्स में भी कहानी केवल पदकों की नहीं रही। पुरुष मैराथन में सावन बरवाल ने 44 साल बाद भारत को एशियन गेम्स पदक दिलाया। पुरुष हाई जंप में भारत ने लंबे अंतराल के बाद पदक पाया, जबकि बरानिका एलंगोवन महिला पोल वॉल्ट में भारत की पहली एशियन गेम्स पदक विजेता बनीं।

और फिर हॉकी—भारत के खेल इतिहास की सबसे भावनात्मक परंपराओं में से एक। भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने मलेशिया को 5-1 से हराकर स्वर्ण जीता और पहली बार एशियन गेम्स हॉकी स्वर्ण का सफलतापूर्वक बचाव किया। इस जीत के साथ भारत ने लॉस एंजेलिस 2028 ओलंपिक के लिए भी सीधे क्वालीफाई किया। महिला हॉकी टीम ने भी स्वर्ण जीता और 44 साल के स्वर्ण-पदक सूखे को समाप्त किया। यानी इस बार कई पदक वर्तमान की जीत से ज्यादा अतीत के अधूरे अध्यायों का समापन थे।

सबसे बड़ी उपलब्धि: खेलों का दायरा बढ़ना
भारत के लिए इस एशियन गेम्स का एक और महत्वपूर्ण संकेत उन खेलों से आया, जो पारंपरिक रूप से भारतीय खेल-चर्चा के केंद्र में नहीं रहे हैं। महिला व्यक्तिगत गोल्फ का स्वर्ण, पुरुष मैराथन का पदक, महिला पोल वॉल्ट का पहला पदक, रोइंग में पहला एशियन गेम्स पदक, MMA में पहला पदक और सॉफ्ट टेनिस में पहला पदक—ये उपलब्धियां बताती हैं कि भारतीय खेल संस्कृति धीरे-धीरे क्रिकेट, हॉकी, बैडमिंटन, कुश्ती और शूटिंग जैसे परिचित नामों से आगे बढ़ रही है। यही बदलाव भविष्य के भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

किसी देश की खेल शक्ति केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसके पास कितने पदक हैं। यह भी देखना पड़ता है कि कितने खेलों में उसके खिलाड़ी पदक जीतने की स्थिति में पहुंच रहे हैं। इस दृष्टि से आइची-नागोया की तस्वीर उत्साहजनक है।

लेकिन पदक कम क्यों हुए?
ईमानदार संपादकीय का काम केवल उपलब्धियों पर तालियां बजाना नहीं, कमियों पर सवाल उठाना भी है। 2022 के हांगझोउ एशियन गेम्स में भारत ने 107 पदक जीते थे। इस बार संख्या 85 रही। शूटिंग, एथलेटिक्स और कुछ पारंपरिक मजबूत खेलों में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं हो सका। शूटिंग में भारत की पदक संख्या पिछली बार के मुकाबले काफी कम रही और टेनिस में भारत 1986 के बाद पहली बार खाली हाथ लौटा। लेकिन यहां भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ है—इस बार भारत का दल हांगझोउ की तुलना में लगभग 25 प्रतिशत छोटा था। इसलिए केवल कुल पदकों की तुलना करके पूरी कहानी तय करना उचित नहीं होगा।

फिर भी सवाल बचता है:
क्या भारत कुछ खेलों में अपनी सफलता को लगातार बनाए रखने के लिए पर्याप्त गहराई तैयार कर पा रहा है?
इसका उत्तर अभी पूरी तरह हां नहीं है।

भारतीय खेल संस्कृति बदल रही है
फिर भी सबसे बड़ा बदलाव मैदान के बाहर दिखाई देता है। आज भारत में खेल केवल कुछ महान खिलाड़ियों की व्यक्तिगत कहानी नहीं रह गया है। छोटे शहरों और कस्बों से आने वाले खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिखाई दे रहे हैं। महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है। ऐसे खेलों में भी भारतीय खिलाड़ी आगे आ रहे हैं जिन्हें कभी मुख्यधारा की खेल संस्कृति में बहुत कम जगह मिलती थी। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया।

खेल विज्ञान, बेहतर प्रशिक्षण, निजी अकादमियों, सरकारी योजनाओं, कॉर्पोरेट समर्थन, बेहतर प्रतियोगिता संरचना और परिवारों की बदलती मानसिकता—इन सभी ने मिलकर भारतीय खेल संस्कृति को बदला है। अब किसी बच्चे का खिलाड़ी बनना हमेशा “पढ़ाई छोड़ने” के रूप में नहीं देखा जाता। धीरे-धीरे यह धारणा बन रही है कि खेल भी करियर है, खेल भी शिक्षा है और खेल भी सामाजिक गतिशीलता का माध्यम है। लेकिन इस बदलाव को अभी गांवों और छोटे शहरों तक समान रूप से पहुंचाना बाकी है।

अगली चुनौती पदक नहीं, व्यवस्था है
एशियन गेम्स की सफलता के बाद सबसे आसान काम होगा खिलाड़ियों की तस्वीरें साझा करना और उनके नाम याद रखना। मुश्किल काम होगा उन व्यवस्थाओं को मजबूत करना जिनसे अगली पीढ़ी के खिलाड़ी तैयार होंगे।
हमें बेहतर जमीनी सुविधाएं चाहिए।
हमें प्रशिक्षित कोच चाहिए।
हमें खेल विज्ञान और स्पोर्ट्स मेडिसिन की पहुंच बढ़ानी होगी।
हमें लड़कियों के लिए सुरक्षित और सुलभ खेल ढांचा चाहिए।
हमें छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिभा पहचानने की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।
और सबसे महत्वपूर्ण—हमें ऐसे खेल वातावरण की जरूरत है जिसमें खिलाड़ी पदक जीतने के बाद ही नहीं, हारने के बाद भी सुरक्षित महसूस करे। क्योंकि हर चैंपियन के पीछे कई ऐसी हार होती हैं जिन्हें कैमरे नहीं दिखाते।

असली रिकॉर्ड शायद 85 नहीं है
आइची-नागोया से लौटते हुए भारत के पास 85 पदक हैं। लेकिन भारतीय खेल की असली उपलब्धि शायद यह संख्या नहीं है। असली उपलब्धि है—पहली बार जीते गए स्वर्ण।असली उपलब्धि है—44 और 48 साल पुराने इंतज़ार का खत्म होना। असली उपलब्धि है—उन खेलों में भारत का दिखाई देना, जिनमें कभी उसका नाम मुश्किल से सुनाई देता था। और असली उपलब्धि यह है कि भारतीय खेल संस्कृति धीरे-धीरे “कुछ सितारों” से निकलकर एक व्यापक खेल पारिस्थितिकी बनने की दिशा में बढ़ रही है। लेकिन यही वह मोड़ भी है जहां आत्मसंतोष खतरनाक होगा। हांगझोउ ने भारत को बताया था कि रिकॉर्ड बनाना संभव है।

आइची-नागोया ने बताया कि रिकॉर्ड के बाद भी कई नए दरवाजे खोले जा सकते हैं। अब अगला लक्ष्य केवल अधिक पदक जीतना नहीं होना चाहिए। लक्ष्य होना चाहिए—
ऐसा भारत बनाना, जहां अगला प्रणवी उर्स, अगली नीरू धांडा, अगला सावन बरवाल या अगला हॉकी चैंपियन किसी बड़े शहर की सुविधा का इंतज़ार न करे।
क्योंकि जब प्रतिभा को अवसर मिलता है, तो पदक केवल जीत नहीं होते—
वे एक बदलते हुए समाज की पहचान बन जाते हैं।
©️✍️शशि धर कुमार, कटिहार, बिहार
Instagram ID: ishashidharkumar