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वीरेंद्र यादव : शब्दों के विवेकशील प्रहरी को श्रद्धांजलि
वरिष्ठ आलोचक वीरेंद्र यादव का देहावसान हिंदी साहित्य जगत के लिए एक गहरी क्षति है। वे केवल आलोचक नहीं थे, बल्कि साहित्य की आत्मा के सजग पहरेदार थे—ऐसे विवेकशील पाठक, जिन्होंने रचना को विचार, समाज और समय की कसौटी पर परखा। उनके….
मकर संक्रांति: उत्तरायण होता लोकजीवन और अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा
भारतीय सभ्यता में पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते; वे समय, समाज और स्मृति के साझा दस्तावेज़ होते हैं। मकर संक्रांति ऐसा ही एक पर्व है—जो खगोलीय घटना से आरंभ होकर लोकजीवन की गहराइयों तक पहुँचता है। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश और उत्तरायण…
युवाशक्ति और स्वामी विवेकानंद की दृष्टि
भारत की आत्मा को आधुनिक युग में जिस व्यक्तित्व ने सबसे अधिक आत्मविश्वास, तेज और वैश्विक पहचान दी, उनमें स्वामी विवेकानंद का नाम अग्रणी है। वे केवल एक संन्यासी या दार्शनिक नहीं थे, बल्कि युवाओं के प्रखर प्रेरक, राष्ट्रनिर्माता और मानवता के चिंतक थे। स्वामी विवेकानंद का मानना था कि किसी भी देश का…
अध्यात्म, ध्यान और चेतना: क्या यह सिर्फ भरे पेट वालों की विलासिता है?
आज के समय में जब महँगाई, बेरोज़गारी, सामाजिक असमानताएँ और मानसिक तनाव लगातार बढ़ रहे हैं, ऐसे में “अध्यात्म, ध्यान और चेतना” जैसे शब्द कई लोगों को या तो दिखावा लगते हैं या पलायनवाद। अक्सर सुनने को मिलता है—“जिनका पेट भरा है, वही ध्यान‑धर्म…
हां भइया, जीवन है ये!
मुंशीप्रेमचंद को समर्पित! शशि धर कुमार द्वारा रचित कविता “हां भइया, जीवन है ये — ना कोई मेले की चकाचौंध, ना छप्पन भोग, बस आधी रोटी, और फटी धोती का संजोग। टूटे खपरैल में सपने टपकते हैं, मां की सूखी छाती पर बच्चे सिसकते हैं।………….जो समाज में फैले भेदभाव को उजागर करती है…
भारतीय समाज में काले और गोरे की मानसिकता
भारत में ‘काले और गोरे’ का मुद्दा केवल त्वचा के रंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की मानसिकता, संस्कृति और इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है। रंगभेद की यह मानसिकता औपनिवेशिक काल से पहले भी विद्यमान थी, लेकिन ब्रिटिश शासन ने इसे और गहरा किया। आज, यह सोच भारतीय समाज..





