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अध्यात्म, ध्यान और चेतना: क्या यह सिर्फ भरे पेट वालों की विलासिता है?
आज के समय में जब महँगाई, बेरोज़गारी, सामाजिक असमानताएँ और मानसिक तनाव लगातार बढ़ रहे हैं, ऐसे में “अध्यात्म, ध्यान और चेतना” जैसे शब्द कई लोगों को या तो दिखावा लगते हैं या पलायनवाद। अक्सर सुनने को मिलता है—“जिनका पेट भरा है, वही ध्यान‑धर्म…
हां भइया, जीवन है ये!
मुंशीप्रेमचंद को समर्पित! शशि धर कुमार द्वारा रचित कविता “हां भइया, जीवन है ये — ना कोई मेले की चकाचौंध, ना छप्पन भोग, बस आधी रोटी, और फटी धोती का संजोग। टूटे खपरैल में सपने टपकते हैं, मां की सूखी छाती पर बच्चे सिसकते हैं।………….जो समाज में फैले भेदभाव को उजागर करती है…
भारतीय समाज में काले और गोरे की मानसिकता
भारत में ‘काले और गोरे’ का मुद्दा केवल त्वचा के रंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की मानसिकता, संस्कृति और इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है। रंगभेद की यह मानसिकता औपनिवेशिक काल से पहले भी विद्यमान थी, लेकिन ब्रिटिश शासन ने इसे और गहरा किया। आज, यह सोच भारतीय समाज..
भुतलाएल जीवन – मैथिली कथा
पूस मास। तिलासंक्रान्ति पाबैन नइ भेल अछि। आठ दिन बाँकी अछि। आइ बीस दिनसँ शीतलहर चलि रहल अछि। सुर्जक केतौ पता नहि अछि। रातिये जकाँ दिनो भेल रहैए। किछु गोरेक मनमे एहनो शंका उठि रहल छैन जे भरिसक आब सुर्ज उगबे ने करत। जाड़ सेहो आन सालक अपेक्षा बेसीए भऽ…
झूठक झालि – मैथिली कथा
अदहा चैत बीत गेल मुदा चैतक जेहेन उष्णता चाही ओ अखन तक मौसममे नहि आएल अछि। जेना आन साल फगुआक पराते लोक अपन-अपन सिरको आ कम्बलोकेँ रौद लगा, समेट कऽ ऐगला जाड़-ले बान्हि कऽ रखि लइ छला, से ऐ बेर नहि भेल। ओना, पहिनौं केतेक साल एहेन होइते छल जइमे…
कुंवर नारायण – साहित्य और दर्शन
कुंवर नारायण हिंदी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर थे। उनके साहित्य में गहन मानवतावादी दृष्टिकोण, दार्शनिकता और जीवन के प्रति एक व्यापक दृष्टिकोण झलकता है। उनकी काव्य रचनाओं, कहानियों, निबंधों, और आलोचनात्मक लेखन में उनके विचारों की गहराई और व्यापकता स्पष्ट रूप से दिखाई…





